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श्री खाटू श्याम जी की पौराणिक कथा...

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खाटू श्याम बाबा

# खाटू श्‍याम बाबा का फाल्गुन मेला अपने अद्भुत भक्तिमय स्वरूप और विराट जनभागीदारी के कारण  पूरे विश्व में विख्यात है। सीकर के खाटू मंदिर में पाण्डव महाबली भीम के पौत्र एवम् घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक का शीश विग्रह रूप में विराजमान है। बर्बरीक जी को उनकी अतुलनीय वीरता व त्याग के कारण भगवान श्री कृष्ण से यह वरदान मिला था कि कलियुग में बर्बरीक स्वयम् श्री कृष्ण के नाम एवं स्वरूप में पूजे जाएँगे। फलतः बर्बरीक श्री श्याम बाबा के रूप में खाटू धाम में पूजे जाते हैं। 
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श्री खाटू श्याम जी की पौराणिक कथा

# महाबली भीम और हिडिम्बा के पुत्र वीर घटोत्कच ने शास्त्रार्थ प्रतियोगिता जीतकर राजा मूर की पुत्री, कामकटंकटा (“मौर्वी”) से विवाह किया| उन्होंने एक वीर पुत्र को जन्म दिया जिसके केश बब्बर शेर की तरह दिखते थे| अतः उनका नाम बर्बरीक रखा गया|
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# आज उन ही वीर बर्बरीक को हम खाटू श्याम बाबा के “श्री श्याम”, “कलयुग के आवतार”, “श्याम सरकार”, “तीन बाणधारी”, “शीश के दानी”, “खाटू नरेश” तथा अन्य अनगिनत नामों से संबोधित करते हैं|

# जब विद्वान बर्बरीक ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा – “हे प्रभु! इस जीवन का सर्वोतम उपयोग क्या है?” इस कोमल एवं निश्छल हृदय से पूछे गए प्रश्न का उत्तर देते हुए श्री कृष्ण बोले – “हे पुत्र, इस जीवन का सर्वोत्तम उपयोग: परोपकार व निर्बल का साथी बनकर सदैव धर्म का साथ देने से है|
# इसके लिये तुम्हे बल एवं शक्तियाँ अर्जित करनी पड़ेगी| अत: तुम महीसागर क्षेत्र में नव दुर्गा की आराधना कर शक्तियाँ अर्जन करो|” श्री कृष्ण ने बर्बरीक का निश्चल एवं कोमल हृदय देखकर उन्हें “सुहृदय” नाम से अलंकृत किया|

# बर्कारिक ने ३ वर्ष तक सच्ची श्रधा और निष्ठा के साथ नवदुर्गा की आराधना की और प्रसन्न होकर माँ दुर्गा ने बर्बरीक को तीन बाण और कई शक्तियाँ प्रदान की जिनसे तीनो लोको को जीता जा सकता था| तत्पश्चात माँ जगदम्बा ने उन्हें “चण्डील” नाम से संबोधित किया|

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# जब वीर बर्बरीक ने अपने माँ से महाभारत के युद्ध में हिस्सा लेने की इच्छा व्यक्त की, तब माता मोर्वी ने उनसे हारने वाले पक्ष का साथ देने का वचन लिया और युद्ध में भाग लेने की आज्ञा दी|

# भगवान श्री कृष्ण जानते थे की कौरवो की सेना हार रही थी| अपनी माता के आज्ञा के अनुसार महाबली बर्बरीक पाण्डव के विपक्ष में युद्ध करेंगे जिससे पाण्डवो की हार निश्चित हो जाएगी| इस अनहोनी को रोकने के लिए श्री कृष्ण ने बर्बरीक को रोका, उनकी परीक्षा ली और अपने सुदर्शन चक्र से उनका सर धड़ से अलग कर दिया|
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