
नोट बंदी पर बहुत बड़ा बवाल मचा हुआ है , विपक्षियों ने आसमान सर पे उठा रखा है लेकिन इसी कोंग्रेस ने देश को ये बताया था कि इस देश की सत्तर प्रतिशत जनता ग़रीब है और उसको मनरेगा एक साथ साथ खाद्य सुरक्षा क़ानून की बहुत ज़रूरत है ।
पूर्व PM मनमोहन सिंह जी ने 2011 में देश के सामने संसद में कहा था कि भारत देश की 81 करोड़ (यानी लगभग 70%) जनसँख्या गरीबी रेखा के नीचे है और उसे केंद्र सरकार की महत्व कांशी योजनायों जैसे “मनरेगा” तथा “खाद्य सुरक्षा क़ानून” की बेहद ज़्यादा जरूरत है । बता दें उस समय की सरकार देश के पूर्व प्रधानमंत्री के अलावा ख़ुद को बड़े दिग्गज अर्थशास्त्री कहने वाले चिदंबरम और मोंटेकसिंह अहलूवालिया भी थे । मनमोहन सिंह जी भी बड़े अर्थशास्त्री थे लगभग हर व्यक्ति उनके ज्ञान का लोहा मानता रहा है ।
पहला बड़ा सवाल
अब ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये उठता है कि जब देश की 70% जनता ग़रीब थी ( जैसा कि उस समय देश के PM ने ख़ुद कहा था) तो फिर देश में 86% नोट बड़ी मुद्रा में यानी कि 500-1000 के क्यों छापे गए ? ये बड़े नोट किसके किसके उपयोग के लिए छापे गए ? क्या 70% ग़रीब जनता का गुज़ारा 500-1000 के नोटों के बिना नहीं हो रहा था ?
दूसरा बड़ा सवाल
UPA के शासन काल में आयी तेंदुलकर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार 70% जनता का रोज का 30-40 खर्च रूपए रोज़ाना का ही था फिर ऐसी ग़रीब जनता को उसे 500-1000 के नोटों की क्या जरूरत थी ? किसके इशारे पर ये बड़े नोट इस मात्रा में छापे गये। मनमोहन सिंह जी ने एतराज़ क्यूँ नहीं किया ? क्या पूर्व PM को उसी समय बड़े नोट बंद नहीं कर देने चाहिएँ थे ?
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